वीरेंद्र सोम के चेहरे के भाव और भी बदतर होते गए। विदुर देव को खूंखार नज़रों से घूरते हुए, उसने मन मसोसकर कहा, "इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि तुम एक 'सफ़ेद अंधकार आत्मा' की यातना को सह सकते हो, तुम पहले से ही एक 'आत्म योद्धा' हो!"
विदुर देव ने उसे बहुत ही बेरुखी से देखा, धीरे से अपने हाथ में छिपा एक खंजर निकाला और उसे लापरवाही से उछाल दिया। खंजर चाँदी की एक लकीर में बदल गया और उसने बहुत ही सटीकता से तरुण सिंह के माथे को छेद दिया, और उसकी खोपड़ी में गहराई तक धंस गया।



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